श्रीमद्भगवद गीता

Category: Gita's Motivation for Overcoming Self-Doubt

Discover motivational verses from Bhagavad Gita to overcome fear, anxiety, and stand up to challenges.

Latest Gita's Motivation for Overcoming Self-Doubt - July 26, 2026

Bhagavad Gita 4.18

Sanskrit Shloka

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः |
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ||४-१८||

Hindi Meaning: जो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, वह योगी सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।।

English Meaning: He who can see inaction in action, and action in inaction, is the wisest among men. He is a saint, even though he still acts.

Aaj Ki Shiksha (Today's Lesson)

वेदान्त के वर्णनानुसार दीर्घकाल तक जब मनुष्य कर्तव्य कर्मों का पालन करता है तब सभी सच्चे साधकों के मन में एक प्रश्न उठता है कि उन्हें कैसे ज्ञात हो कि उन्होंने पूर्णत्व की स्थिति प्राप्त कर ली है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण उस स्थिति का वर्णन कर रहे हैं।

He who can see inaction in action, and action in inaction, is the wisest among men।

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July 25, 2026

Bhagavad Gita 5.6

आत्मज्ञान की साधना में कर्म के स्थान के विषय में प्राचीन ऋषिगण जिस निष्कर्ष पर पहुँचे थे भगवान् यहाँ उसका ही दृढ़ता से विशेष बल देकर प्रतिपादन कर रहे हैं। कर्मपालन के बिना वास्तविक कर्मसंन्यास असंभव है।

July 24, 2026

Bhagavad Gita 17.13

इस श्लोक में कथित प्रकार से किया हुआ यज्ञ न यज्ञकर्ता के लिए सुखवर्धक सिद्ध होता है और न समाज के अन्य लोगों के लिए लाभदायक। अन्नदान रहित धर्मशास्त्र की भाषा में।

July 23, 2026

Bhagavad Gita 10.16

राजपुत्र अर्जुन को इस बात का निश्चय हो गया है कि भगवान् ही विश्व के अधिष्ठान हैं। जिनके बिना विश्व का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता।

July 22, 2026

Bhagavad Gita 11.5

यदि समस्त आभूषण का मूल तत्त्व स्वर्ण है। तो विश्व का प्रत्येक आभूषण समष्टि स्वर्ण में उपलब्ध होना चाहिए।

July 21, 2026

Bhagavad Gita 3.14

कल्याणकारी मार्ग पर आगे बढ़ें; अपने कर्तव्य पथ पर सदा स्थिर रहें।

July 20, 2026

Bhagavad Gita 6.14

कुछ काल तक ध्यान का निरन्तर अभ्यास करने के फलस्वरूप साधक को अधिकाधिक शांति और सन्तोष का अनुभव होता है अत्यन्त सूक्ष्म आन्तरिक शांति को प्राप्त पुरुष को यहाँ प्रशान्तात्मा कहा गया है। आत्मा को अपने शुद्ध और दिव्य स्वरूप में व्यक्त होने के लिए प्रशान्त अन्तकरण ही अत्यन्त उपयुक्त माध्यम है।

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