श्रीमद्भगवद गीता

Aaj Ki Shiksha - July 31, 2026 - Bhagavad Gita 10.32

Aaj Ki Shiksha: Gita's Motivation for Overcoming Self-Doubt

Sanskrit Shloka

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन |
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ||१०-३२||

Hindi Meaning: हे अर्जुन ! सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य भी मैं ही हूँ, मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या और विवाद करने वालों में मैं वाद हूँ।।

English Meaning: I am the Beginning, the Middle and the End in creation; among sciences, I am the science of Spirituality; I am the Discussion among disputants.

Today's Teaching

Aaj Ki Shiksha: मैं सृष्टियों का आदि। अन्त और मध्य भी हूँ अपनी विभूतियों का वर्णन प्रारम्भ करने के पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण का सामान्य कथन ही यहाँ प्रतिध्वनित होता है।

Life Lesson: I am the Beginning, the Middle and the End in creation; among sciences, I am the science of Spirituality; I am the Discussion among disputants।

मैं सृष्टियों का आदि? अन्त और मध्य भी हूँ अपनी विभूतियों का वर्णन प्रारम्भ करने के पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण का सामान्य कथन ही यहाँ प्रतिध्वनित होता है। वहाँ उन्होंने यह बताया है कि वे किस प्रकार प्रत्येक वस्तु और प्राणी की आत्मा हैं जबकि यहाँ वे सम्पूर्ण सृष्टि के अधिष्ठान के रूप में स्वयं का परिचय करा रहे हैं।कोई भी पदार्थ अपने मूल उपादानस्वरूप ऋ़ा त्याग करके नहीं रह सकता। स्वर्ण के बिना आभूषण? समुद्र के बिना तरंग और मिट्टी के बिना घट का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। समस्त नाम और रूपों में उनके उपादान कारण का होना अपरिहार्य है। उपर्युक्त कथन के द्वारा भगवान् अपने सर्वभूतात्म भाव की दृष्टि से कहते हैं कि वे सृष्टियों के आदि? मध्य और अवसान हैं। विश्व की उत्पत्ति? स्थिति और लय ये सब उनमें ही होते हैं।जिस ज्ञानस्वरूप के बिना अन्य वस्तुओं के ज्ञान कदापि संभव नहीं हो सकते? उस चैतन्यस्वरूप का ज्ञान सब ज्ञानों का राजा होना उपयुक्त ही है। सूर्यप्रकाश में ही समस्त वस्तुयें प्रकाशित होती हैं। वस्तुओं पर सूर्यप्रकाश के परावर्तित होने से ही वे दर्शन के योग्य बन जाती हैं। स्वाभाविक ही? भौतिक वस्तुओं के दर्शन में सूर्य सब नेत्रों का नेत्र है। उसी प्रकार? सब विद्याओं में अध्यात्मविद्या को राजविद्या या सर्वविद्याप्रतिष्ठा कहा गया है।मैं विवाद करने वालों में वाद हूँ श्रीशंकराचार्य के अनुसार? यहाँ प्रयुक्त प्रवदताम् शब्द से तात्पर्य विवाद के प्रकारों से है? व्यक्तियों से नहीं। जीवन के सभी क्षेत्रों में विवाद के तीन प्रकार हैं जल्प? वितण्डा और वाद। जल्प में? एक व्यक्ति प्रमाण और तर्क के द्वारा अपने पक्ष की स्थापना तथा विरोधी पक्ष का छल आदि प्रकारों से खण्डन करता है। जब कोई एक व्यक्ति अपने पक्ष को स्थापित करता है? और अन्य व्यक्ति छल आदि से केवल उसका खण्डन ही करता रहता है? परन्तु अपना कोई पक्ष स्थापित नहीं करता? तब उसे वितण्डा कहते हैं। गुरु शिष्य के मध्य अथवा अन्यों के मध्य तत्त्वनिर्णय के लिए जो युक्तियुक्त विवाद होता है उसे वाद कहते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि जल्प और वितण्डा में उभय पक्ष का लक्ष्य केवल जयपराजय अथवा शक्ति परीक्षा मात्र होता है? जब कि वाद का लक्ष्य तथा फल तत्त्व निर्णय है। अत? भगवान् कहते हैं कि? मैं विवादों के प्रकारों में वाद हूँ।आगे

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